राष्ट्रपति की पत्नी को प्राणदान
राष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरि की आस्था महाराज पर उस समय से थी जब वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। वे बहुधा उनके दर्शन करने जाया करते और अपने परिकरों के समक्ष उन्हें साष्टांग प्रणाम करते।
कभी वे स्वयं जाकर बाबा को अपनी कार में राजभवन ले जाते और वहाँ उनका स्वागत करते। गिरि जी के सभी मनोरथ उनकी कृपा से पूरे होते रहे। जब आपने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा तो महाराजजी का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना से आप कैंची आश्रम, नैनीताल में आकर उनके चरणों में गिर गये।
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बाबा उनके ऊपर अपना वरद् हस्त रखते हुए स्वतः बोले, “चुनाव जीतना चाहता है।
चिन्ता मत कर तू राष्ट्रपति बनेगा।” इस प्रकार गिरि जी अपनी विषम परिस्थितियों में बाबा से सम्पर्क बनाये रहे और उनकी कृपा से सदा लाभान्वित होते रहे।
कादम्बिनी नवम्बर 1984 (तंत्र विशेषांक) में डाक्टर आर. के. करौली जी ने अपना एक अनुभव व्यक्त किया है।
आप कहते हैं कि जिगर के काम न करने से श्री गिरि जी की पत्नी मूर्च्छित दशा में विलिंगटन नर्सिंग होम में पड़ी थी और आपका इलाज चल रहा था। सब प्रकार की चिकित्सा सुविधाओं और चेष्टाओं के बाद भी उनकी दशा गम्भीर होती जा रही थी।
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आपने गिरि जी को स्थिति से अवगत करते हुए बताया कि ये अब जा रही हैं। गिरि जी ने अनुरोध किया कि किसी प्रकार जब रात्रि के दो बजे तब उन्हें जीवित रखने का प्रयत्न किया जाये।
सभी प्रकार की उत्तेजक औषधियाँ ग्लूकोज में मिलाकर उनके शरीर में पहुँचायी गयी। साँस दिलाने वाले पम्प का प्रयोग किया गया और पेसमेकर द्वारा हृदय गति देने का प्रयास भी किया गया।
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रात के पौने दो बजे सभी प्रयत्न विफल हो गये। गिरि जी बराबर उस कक्ष में घड़ी को ही देखते जा रहे थे। दो बजे श्रीमती गिरि ने एक साँस ली और फिर उनकी साँस सामान्य रूप से चलने लगी।
सुबह तक वे होश में आ गयीं और बाद में पूरी तरह स्वस्थ हो गयीं।
जब डॉ. करौली जी ने उनसे रात्रि के दो बजे का रहस्य जानना चाहा तो गिरि जी ने कहा कि नीब करौरी बाबा ने उन्हें ऐसा कहा है। जो मृत में प्राणों का संचार करने की क्षमता रखते थे।